
Sunday, May 25, 2008
Tuesday, May 20, 2008
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Sunday, May 18, 2008
Saturday, May 10, 2008

Monday, May 5, 2008
Friday, April 4, 2008

रीतू नेगी
कितना मासूम होता हैं लड़कपन
सच होता हैं मन जैसे दर्पण
सबसे अलग भी उनका हठपन
अधूरा हैं जीवन इनके बिना
उनके लिए जिए वही हैं जीना
सब कुछ भी जो गया अपना छीना
बच्चे हैं जो साथ तो पास हैं नगीना
बस एक ही प्रार्थना हैं भगवान से
अपना रास्ता चुने वो सच्चाई से
भटके न कदम दुनिया की चकाचौंध से
बचाके रखे उन्हें हर आनेवाली मुश्किल से
।। कविता ।।
युएसए का प्रवासी साहित्य
तीन कविताएँ
प्रतिभा सक्सेना
वही दृष्टि
मन सम्हाले नहीं सम्हलता ,
कभी जब अपना देश बहुत दूर लगता है,
ढूँढता फिरता है उस मिट्टी की छुअन !
समझाती हूँ उसे - 'भाग मत पगले,
सारा देश देख ले यहीँ -
अय्यर, दार जी शर्मा, गुप्ता किशोर भाई, कालेल कर, बाबू मोशाय,
सब तो हैं
तमिल-तेलुगू, हिन्दी, गुरुमुखी बँगला गुजराती-मराठी ,
सुनता क्या नहीं रे !
सारा हन्दुस्तान सिमट आया यहाँ
एक ही कथा जिसके पात्र हम सब
धारे अपना वहीं वेष !'
दुर्गा लक्ष्मी और गणपति रचनेवाली देश की माटी
दीवाली, गणेश चतुर्थी, नवरात्र और हल्दी कुमकुम दे
हर बरस जता जाती
कि जीवन-मृत्यु दो छोर हैं समभाव से ग्रहण करो !
सृजन को उल्लास और विसर्जन को उत्सव बना लो-
यही है जीवन का मूल राग !
यहाँ की चकाचौंध जिसे भरमा ले
दौड़ती भागती बिखरन ही उसके हाथ आई
तृप्ति तो मुझे कहीं नज़र नहीं आई ।
इस नई दुनिया की
आँखों को चौंधियाती चमक, देखो, कितने दिन की!
पर सदियों की परखी
पुराने की अस्लियत अंततः सामने आ ही जाती है ।
यहाँ रह कर अपने उस छूटे हुये घर-द्वार की याद किसे नहीं आती?
अकेले में किसका आँख नहीं भर आती !
जीवन का जो अंश वहाँ छोड़ आये
उसकी कमी किसे नहीं सताती ।
कभी अकेले में
किसकी आँख नहीं भऱ आती !
और वही दृष्टि इन सब आँखों में देख
एक गहरा संतोष मन को आश्वस्ति से भर जाता है ।
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बुज़ुर्ग पेड़
कुछ रिश्ता है ज़रुर मेरा इन बुज़ुर्ग पेड़ों से !
देख कर ही हरिया जाती हैं आँखें,
उमग उठता है मन, वैसे ही जैसे
मायके की देहरी देख, कंठ तक उमड़ आता हो कुछ !
बाँहें फैलाये ये पुराने पेड़ पत्तियाँ हिलाते हैं हवा में,
इँगित करते हैं अँगुलियों से -
आओ न, कहाँ जा रही हो इस धूप में
थोड़ी देर कर लो विश्राम हमारी छाया में !
मेरी गति-विधियों से परिचित हैं ये,
मुझमें जो उठती हैं उन भावनाओं का समझते हैं ये !
नासापुट ग्रहण करते हैं हवाओं में घुली
गंध अपनत्व की !
एक नेह-लास बढ़ कर छा लेता है मुझे !
बहुत पुराना रिश्ता है मेरा !
इन बुज़ुर्ग पेड़ों से !
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मन का चोर !
मेरे मन में एक चोर है
जो मेरे सामने आने से घबराता है !
जब मैं उसे ढूँढने जाती हूँ
तो जाने किस कोने में
दुबक कर छिप बैठता है,
और मैं हँस पडती हूँ
स्वयं के सन्देह को झूठा मान कर !
पर भीतर ही भीतर मैं बहुत भय खाती हूँ उससे !
कहीं ऐसा न हो
कि अभी जहाँ वह मुझसे छिपता फिरता है ,
वैसे मैं ही अपने से छिपती फिरूँ !
जरा सी छूट पाते ही
वह मुझे ले डूबेगा
एकाग्रता से जोड-जोड कर जो संचित किया है
उससे वंचित कर डालेगा वह मुझे !
कोई माने या न माने
मेरे मन में एक चोर है
जो मेरे ही सामने आने से घबराता है !
गहन निराशा के अंधे क्षणों में जब जब मैं भटक गई
तीव्र विराग में हताश सी अकर्मण्य हो बैठ गई
उसने धीमे से सिर उठाया और अनायास मैं चौंक गई !
ओ मेरे पहरेदार पूरी-पूरी चौकसी रखना
प्रतिक्षण सजग करते रहना मुझे तुम !
कहीं ऐसा न हो कि पाँसा पलट जाये और वह मुझे ही लूट ले !
कोई जाने या न जाने मै जानती हूँ
मेरे मन में एक चोर है
जो मेरे ही सामने आने से घबराता है !
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प्रतिभा सक्सेना
फ़ोल्सम, केलिफ़ोर्निया, यू.एस.ए.
Tuesday, March 25, 2008
Sunday, March 9, 2008
हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय की और अधिक जानकारी के लिए !

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हमारा सपना पूरा होगा !-------------------------------------------------------------------------

Saturday, March 8, 2008
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आए सामने तेरा चेहरा
तुम क्या गई हो ज़िंदगी से
हो गया हूँ और भी तनहा
तुम्हारी वो हँसी
वो पहली मुलाकात
मुस्कान छोड़ जाती है !
तुम्हारी बातों के वाना
दिल में अब तक मचला करते हैं
क्यों दिल की बात न कह सके
अपने आप से शिकायत करते हैं !
बेवफाई का दाग तुम्हे देके
अपने आप को बचाना चाहते हैं
लफ्जों के बानों से हा
ममोहोब्बत इन्तेहा जताना चाहतें हैं !
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पर अब आंखो में सिर्फ़ नफरत उभरना
अब नहीं करता हूँ मैं तुझसे प्यारा
नहीं बन न चाहता हूँ मैं तेरा यारा
पर क्या इसकी इजाज़त देता है मुझे मेरा प्यार ?
Friday, March 7, 2008

न जाने आजकल यह क्या हो गया है मुझे
ह्ल्की सी आहट सुन दिल कह्ता है कि तू आई है
एक अजीब मगर खूबसूरत सा धोखा हो गया है मुझे
न जाने ....
हर फूल में नजर आता ह बस तुम्हारा ही चेहरा
तितलिंयों और भंवरो से शिकवा हो गया है मुझे
न जाने ...
मेरी रातें गुजरती हैं आजकल करवटें बदलते हुए
चांद तारों से ही अब तो वास्ता हो गया है मुझे
न जाने ....
बहुत परेशां था गम ए जिन्दगी से अब तके
तेरे प्यार की आस में होसला हो गया है मुझेन जाने ......

सब कुछ तो खो गया है, क्या पास रह गया है
फिर से कभी मिलेंगे दिल तोड़कर गये जो
उनका भी दोष क्या हम थे न उनके काबिल
यह सोचकर हमारा सब रंज बह गया है
हाथों से फिसले लम्हे, फिर किसको मिल सके हैं

दो ग़ज़लें
लब पे न सजाना अब नग्मों की तरह मुझ को
इल्जाम ज़माने के कुछ कम तो न थे मुझ पर
तूने भी सताया है औरों की तरह मुझ को
इस रंजे वफ़ा से मैं मर कर ही चलो छूटूं
हर ग़म से 'अनंत' उसको रखती हूँ बचा कर मैं
तिरे ख़्याल के साँचे में ढलने वाली नहीं
तू मुझको मोम समझता है पर ये ध्यान रहे
तिरे लिये मैं ज़माने से लड़ तो सकती हूँ
मैं अपने वास्ते भी ज़िंदा रहना चाहती हूँ
हरेक ग़म को मैं हँस कर ग़ुज़ार देती हूँ अब
Anant Kaur
5 Mapleshade Rd
Milltown, NJ 08850

जड़ें चमक रही हैं
ढेले खुश
घास को पता है
चीटियों के प्रजनन का समय
क़रीब आ रहा है
दिन-भर की तपिश के बाद
ताज़ा पिसा हुआ गरम-गरम आटा
एक बूढ़े आदमी के कंधे पर बैठकर
लौट रहा है घर
मटमैलापन अब भी
जूझ रहा है
कि पृथ्वी के विनाश की ख़बरों के ख़िलाफ़
अपने होने की सारी ताक़त के साथ
सटा रहे पृथ्वी से ।
मैं लाश नहीं हूँ
जो तैरता रहूँ ऊपर ही ऊपर ही पानी पर
मैं ज़िंदगी हूँ
अतल गहराईयों में जाऊँगा
सीप से मोती निकाल लाऊँगा
मैं तिनका नहीं हूँ
जो उलझ जाऊँ किसी चोर की दाढ़ी में
मैं गरीब की बीड़ी का लुक हूँ
हवाओं में उडूँगा
शोषकों की बस्ती में
आग लगाऊँगा !
क्यों करता है मन
हरदम किसी की आशा
क्यों चाहता है दिल
हरदम किसी को पास
क्यों एकाएक
कोई चेहरा
अच्छा लगता है
क्यों एकाएक
कोई दिल
सच्चा लगने लगता है
क्यों उतर जाता है कोई
दिल की गहराइयों में
क्यों कूकती है कोयल
मन की अमराईयों में
क्यों लगता है कि किसी पर
अपना सारा मन उडेल दूँ
किसी पर
सारा जहान बिखेर दूँ !
Thursday, March 6, 2008

कितने राजे आये,प्रेम पंरपरा न डिगा पाये,
प्रेम दिवस है नाम दिया, संत ने जीवनदान दिया,
व्यथा है, एक कथा है, प्रेम की सदैव यही प्रथा है,
मैं बद से बदतर हुआ जाता हूँ
शाम कितनी हसीन हो जाती है
अब तो खुष्क पत्तों पर
देखो न! यह मेरी कैसी तक़दीर है
तुमसे जुदा तो ख़ुद से जुदा रहता हूँ
देखो न! यह कैसी मेरी तक़दीर है
मैं तेरी चाहत रखता हूँ राहें तकता हूँ
दिन-रात तेरा ग़म ही ग़म है मुझे
सामने तेरा आना, शरमाना, नज़रें चुराना
इस तरह ऐसे हाल में कब तक जियूँगा
मेरा दीवाना दिल धड़कता है, तेरे लिए
मेरी रूह को सुकूँ दे, जीने को कोई जुनूँ दे
सामने तेरा आना, शरमाना, नज़रें चुराना
मेरी आशिक़ी हद पार कर जायेगी
मेरा दीवाना दिल धड़कता है, तेरे लिए
Wednesday, March 5, 2008

तुमने शुरू किया तमाम तुम ही करोगे
हम बदमिज़ाज ही सही दिल के बुरे नहीं
बदनाम करके हमको बड़ा काम करोगे
हर दाम पे 'सागर ' उन्हें तो नाम चाहिए
एक ऐसी भी घड़ी आती है
अब यहाँ कैसे रोशन होती
हो लिखी जिनके मुकद्दर में खिजां
एक अर्से से खुद में खोए हो
कच्चा-पक्का मकान था अपना
अपना तुमको समझ लिया हमने
वो भी गैरों-सी बात करने लगे
है पीपल ना पेड़ बेरी का
इससे आगे तो रास्ता ही नहीं
Tuesday, March 4, 2008

रात भर आँसू से जो लिखी गई ,
सुबह उस कहानी का
सौदा हुआ !
आरजू का आरजू से रिश्ता ही क्या ,
तुम किसी के हुए मैं किसी का हुआ !
देखिये कब कोई पढने वाला मिले ,
मैं हूँ अपने ही बजूद पर लिखा हुआ ,
प्यार का वो सफर हूँ जिसको 'सागर '
एक ही बादल
मिला
वो भी बरसा हुआ !
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वो शाम फिर आ गई
जो तेरी याद दिलाती है
जो ढलते सूरज के साथ
तेरे अहसास की रौशनी लाती है
दूर हिमालय पर जब
सूरज धरती की गोद मैं समां जाता हैं
अहसास तेरा दिल को चुराकर
मेरे रोम रोम मैं समां जाता है
तू नही हैं अब
जानता हूँ पर मान न सका कभी
पल पल तू याद आती है
तुझे न भुला सका कभी
रोज आती है वो शाम
दिल पर दस्तक देती हैं
गम के बदल घिर आते है फिर
और तेरी याद आंसू बनकर बह जाती है !
Monday, March 3, 2008

इश्क मैं इल्जाम उठाना जरुरी है !
सफ़र के बाद अफ़साने ज़रूरी हैं ना भूल पाए वो दीवाने ज़रूरी हैं
जिन आँखों में हँसी का धोखा हो उन के मोती चुराने ज़रूरी हैं
माना के तबाह किया उसने मुझे , मगर रिश्ते निबाहने ज़रूरी हैं
ज़ख़्म दिल के नासूर ना बन जाए मरहम इन पे लगाने ज़रूरी हैं
माना वो ज़िंदगी हैं मेरी लेकिन , पर दूर रहने के बहाने ज़रूरी हैं
इश्क़ बंदगी भी हो जाए, कम हैं, इश्क़ में इल्ज़ाम उठाने ज़रूरी हैं
महफ़िल में रंग ज़माने के लिए , दर्द के गीत गुन-गुनाने ज़रूरी है
रात रोशन हुई जिनसे ,सारी , सुबह वो चिराग बुझाने ज़रूरी
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जिन्दगी मौत और हम ।
जिन्दगी में क्या है तन्हा ,
जिन्दगी मौत और हम ।
दुनिया में क्या है बेवजह ,
जिन्दगी मौत और हम ।
दुनिया में क्या है बिखरा ,
जिन्दगी मौत और हम ।
दुनिया में क्या है अपना ,
जिन्दगी मौत और हम ।
दुनिया में क्या है बुरा ,
जिन्दगी मौत और हम ।
दुनिया में क्या है उलझा ,
जिन्दगी मौत और हम ।
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कुछ पन्नों को छोड के अब
कुछ पन्नों को छोड के अब मुझको लिखना होगा ।
यंकी है मुझको , तुमको जा के फिर वापस आना होगा ।।
आयेगा जब जाकर के तू , आयेगा जब जाकर के तू ,
कितना कुछ होगा जो , तुझको मुझसे केहना होगा ।
लिख लुँगा मैं अपनी बातें पन्नों पर ही सारी ,
आकर तुझको मेरी बातें पन्नों से ही सुनना होगा ।
तुझ बिन जीवन , जान बिना कैसे बीता ,
मुझको जीना और तुझको बस सुनना होगा ।
साथ रहे बरसों हम , अब दूर भी रह कर देंखें ,
दूरी आने से रिश्ता ये , गहरा और गहरा होगा ।
छुटे हुए पन्नों की बातें पास तुम्हारे जा बैठी है ,
आते में लेते आना ,पन्नों पे फिर लिखना होगा ।
hemjyotsana
इनकी और अधिक ग़ज़ल और कविता के लिए





