Friday, March 7, 2008


आप के लिए मेरी [संजय सेन सागर] की कुछ और अनमोल गजल

अहसास
सब कुछ तो खो गया है, क्या पास रह गया है

तुम साथ हो, यह झूठा अहसास रह गया है
फिर से कभी मिलेंगे दिल तोड़कर गये जो

उम्मीद तो नहीं पर विश्वास रह गया है
उनका भी दोष क्या हम थे न उनके काबिल
यह सोचकर हमारा सब रंज बह गया है
हाथों से फिसले लम्हे, फिर किसको मिल सके हैं

जाती हवा का झोंका,चुपके से कह गया है।!

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गजल...!

कभी ह॑से कभी मुस्करा हम दिये !

यू॑ ही खता उनकी, भुला हम दिये !

अपने पैरो पर भरोसा है बहुत !

इसलिये हर कन्धा, ठुकरा हम दिये !!

सच, दोस्तो का मोहताज नही है !

यही सोच, कदम, बढा हम दिये !!

सोच-सोच कर अब आ रही है ह॑सी !

क्यो अन्धो को आइना, दिखा हम दिये !!

दर्द ही मिला था विरासत मे दोस्तो !

कुछ उभर आये, कुछ दबा हम दिये !!

'सागर ’ ने दी थी आग, हवन की खातिर !

जलने लगे जब घर, तो बुझा हम दिये !!

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गजल !

हर शहर मे भीड हर गा॑व वीरान है !

बाप गा॑व मे, बेटा शहर मे परेशान है !!

वो शख्श जो फ़टेहाल, भूखा ऒर न॑गा है !

कोई ऒर नही अपने ही देश का किसान है !!

ही ख्वाहिशे जल कर भस्म हुई !

हर दिल मे कही ना कही, कोई शमशान है !!

कोई वजह है, जो चुप रहा करते है !

वरना वो गू॑गे नही उनके भी जुबान है !!

वो बच्चा रो रो कर सोया है अभी !

देखो उसके माथे पर चोट का निशान है !!

'सागर ’ अब चल फ़िर कर ऒर कही देखे !

बहुत बडी दुनिया बहुत बडा जहान है !!



।। ग़ज़ल ।।
दो ग़ज़लें

अनन्त कौर



लब पे न सजाना अब नग्मों की तरह मुझ को

बेहतर है भुला दो तुम ख्वाबों की तरह मुझ को

इल्जाम ज़माने के कुछ कम तो न थे मुझ पर
तूने भी सताया है औरों की तरह मुझ को

इस रंजे वफ़ा से मैं मर कर ही चलो छूटूं

ऐ दोस्त मिटा दे तू लफ्जों की तरह मुझ को


भेजे हैं गुलाब उस ने पर आप नहीं आया

तोहफे भी दिए उसने काँटों की तरह मुझ को

हर ग़म से 'अनंत' उसको रखती हूँ बचा कर मैं

है उस की मुहब्बत भी बच्चों की तरह मुझ को

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तिरे ख़्याल के साँचे में ढलने वाली नहीं

मैं ख़ुशबुओं की तरह अब बिखरने वाली नहीं

तू मुझको मोम समझता है पर ये ध्यान रहे

मैं एक शमा हूँ लेकिन पिघलने वाली नहीं

तिरे लिये मैं ज़माने से लड़ तो सकती हूँ

तिरी तलाश में घर से निकलने वाली नहीं

मैं अपने वास्ते भी ज़िंदा रहना चाहती हूँ

सती हूँ पर मैं तेरे साथ जलने वाली नहीं

हरेक ग़म को मैं हँस कर ग़ुज़ार देती हूँ अब

की ज़िंदगी की सज़ाओं से डरने वाली नहीं !!

Anant Kaur
5 Mapleshade Rd
Milltown, NJ 08850

।। जड़ें ।।


जड़ें चमक रही हैं
ढेले खुश
घास को पता है
चीटियों के प्रजनन का समय
क़रीब आ रहा है

दिन-भर की तपिश के बाद
ताज़ा पिसा हुआ गरम-गरम आटा
एक बूढ़े आदमी के कंधे पर बैठकर
लौट रहा है घर

मटमैलापन अब भी
जूझ रहा है
कि पृथ्वी के विनाश की ख़बरों के ख़िलाफ़
अपने होने की सारी ताक़त के साथ
सटा रहे पृथ्वी से ।

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।। मैं ज़िंदगी हूँ ।।


मैं लाश नहीं हूँ
जो तैरता रहूँ ऊपर ही ऊपर ही पानी पर
मैं ज़िंदगी हूँ
अतल गहराईयों में जाऊँगा
सीप से मोती निकाल लाऊँगा

मैं तिनका नहीं हूँ
जो उलझ जाऊँ किसी चोर की दाढ़ी में
मैं गरीब की बीड़ी का लुक हूँ
हवाओं में उडूँगा
शोषकों की बस्ती में
आग लगाऊँगा !


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।। शायद प्यार के कारण ।।

क्यों करता है मन
हरदम किसी की आशा
क्यों चाहता है दिल
हरदम किसी को पास
क्यों एकाएक
कोई चेहरा
अच्छा लगता है
क्यों एकाएक
कोई दिल
सच्चा लगने लगता है
क्यों उतर जाता है कोई
दिल की गहराइयों में
क्यों कूकती है कोयल
मन की अमराईयों में
क्यों लगता है कि किसी पर
अपना सारा मन उडेल दूँ
किसी पर
सारा जहान बिखेर दूँ !





Thursday, March 6, 2008



प्यार भरी ग़ज़लों का खजाना आपके लिए सिर्फ़ ''यादों की किताब'' पर



ये प्रेम कभी न रुका है
व्यथा है, एक कथा है, प्रेम की सदैव यही प्र‍था है,
वर्ष बीते अनेक किंतु प्रेम बलिदान ने इतिहास रचा है,
प्रीत रीत उस भले मानस की,आज भी प्रेरणास्त्रोत उंचा है,
कितने राजे आये,प्रेम पंरपरा न डिगा पाये,

कोयल सी इस कूक को, गीदड़बग्घी से न उरा पाये,
कष्ट, पीड़ा की न सीमा,पर न कोई इसे मिटा पाये,
प्रेम दिवस है नाम दिया, संत ने जीवनदान दिया,

पाठ पढ़ाया, प्रेम बिना न कोई जीवन,
प्रेमपथ रोड़ा उस मृत्यु को भी सम्मान दिया,
व्यथा है, एक कथा है, प्रेम की सदैव यही प्र‍था है,

कभी रुप वेलेंटांइस, कभी जन मानस ब्यार,
बहती गंगा मानिंद ये प्रेम कभी न रुका है !!

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तन्हाई यूँ ढूँढ़ती है मुझे


तन्हाई यूँ ढूँढ़ती है मुझे
जैसे मेरी सदा तुम्हें
जो दीवारें ख़ुद-ब-ख़ुद गिरती हैं
मैं कैसे चुनावाऊँ उन्हें


मैं बद से बदतर हुआ जाता हूँ
याद कर-करके तुम्हें
ख़िज़ाँ भी ख़ुशरंग हुई जाती है
खुष्क पत्ते पहने-पहने


शाम कितनी हसीन हो जाती है
पहने के रात के गहने
ऐसी शाम भी सादी लगती है मुझे
यह दर्द क्या पता तुम्हें


अब तो खुष्क पत्तों पर
ओस की तरह जीता हूँ…

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तेरी तस्वीर से बातें करता


तेरी तस्वीर से बातें करता रोज़ मैं
पास मेरे जो तेरी कोई तस्वीर होती
तुम्हें प्यार बेइंतिहाँ प्यार करता मैं
पास जो जानाँ मेरे आज तुम होती


देखो न! यह मेरी कैसी तक़दीर है
न तुम हो न तुम्हारी कोई तस्वीर है
दिन-रात तेरा ग़म ही ग़म है मुझे
सीने में साँसों की टूटी हुई ज़ंजीर है


तुमसे जुदा तो ख़ुद से जुदा रहता हूँ
सच्चे दिल से तुम्हें प्यार करता हूँ
न मर सकता हूँ मैं, न जी सकता हूँ
मैं तो सिर्फ़ तुम्हें ही चाह सकता हूँ


देखो न! यह कैसी मेरी तक़दीर है
न तुम हो न तुम्हारी कोई तस्वीर है


मैं तेरी चाहत रखता हूँ राहें तकता हूँ
थोड़ा सौदाई, थोड़ा दीवाना लगता हूँ
क़िस्मत की लकीरों में सिर्फ़ तुम हो
मैं रात और दिन तेरा नाम रटता हूँ


दिन-रात तेरा ग़म ही ग़म है मुझे
सीने में साँसों की टूटी हुई ज़ंजीर है

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मेरा दीवाना दिल धड़कता है


मेरा दीवाना दिल धड़कता है, तेरे लिए
पल-पल चोरी-चोरी तड़पता है, तेरे लिए
जीता है तेरे लिए, मरता है तेरे लिए


सामने तेरा आना, शरमाना, नज़रें चुराना
उफ़! तेरी हर तिरछी क़ातिल अदा पर
मेरा फ़िदा हो जाना, कुछ न कह पाना


इस तरह ऐसे हाल में कब तक जियूँगा
तेरे क़रीब होकर भी दूर कब तक रहूँगा
मेरा आँखों से कहना, तेरा आँखों से पढ़ना
बड़ा मुश्किल है, दूर रहना, सब सहना


मेरा दीवाना दिल धड़कता है, तेरे लिए
पल-पल चोरी-चोरी तड़पता है, तेरे लिए
जीता है तेरे लिए, मरता है तेरे लिए


मेरी रूह को सुकूँ दे, जीने को कोई जुनूँ दे
प्यार मुश्किल, तन्हाई हासिल न बना
मेरा दिल चाँद है, चाँदनी की तलाश है
हाँ कह भी दे तू दिल के आस-पास है


सामने तेरा आना, शरमाना, नज़रें चुराना
उफ़! तेरी हर तिरछी क़ातिल अदा पर
मेरा फ़िदा हो जाना, कुछ न कह पाना


मेरी आशिक़ी हद पार कर जायेगी
यह जान जायेगी, गर तू मुझे आज़मायेगी
सामने से गुज़रते हो, और सब जानते हो
बता भी दो मेरी जान, तू कब चाहेगी


मेरा दीवाना दिल धड़कता है, तेरे लिए
पल-पल चोरी-चोरी तड़पता है, तेरे लिए
जीता है तेरे लिए, मरता है तेरे लिए !


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

लेखन वर्ष: ०६ मई २००३